मातोश्री के बाहर बगावत, उद्धव पर ‘गद्दारी’ के आरोप

मातोश्री के बाहर बगावत, उद्धव पर ‘गद्दारी’ के आरोप

मुंबई महानगरपालिका चुनाव की हलचल के बीच शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे के निवास ‘मातोश्री’ के बाहर मंगलवार को जोरदार हंगामा हुआ। टिकट वितरण से नाराज शिवसैनिकों ने नारेबाज़ी की और भावनात्मक अंदाज में आरोप लगाया कि उद्धव ने मेहनती जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ गद्दारी की है

कार्यकर्ताओं का आरोप है कि दशकों से पार्टी के लिए काम करने के बावजूद उन्हें सिर्फ झंडे लगाने और भीड़ जुटाने तक सीमित कर दिया गया, जबकि टिकट उन्हीं नेताओं के परिवारों को दिया जा रहा है, जिन पर स्थानीय स्तर पर नाराजगी है।


श्रद्धा जाधव पर सबसे बड़ा विरोध, परिवारवाद के आरोप

सबसे ज्यादा विरोध वार्ड 202 से पूर्व मेयर श्रद्धा जाधव को फिर टिकट दिए जाने को लेकर हुआ। स्थानीय शिवसैनिकों का कहना है कि सर्वे में उनके खिलाफ माहौल था, इसके बावजूद टिकट उनके ही नाम पर फाइनल किया गया, जबकि वे अपने बेटे पवन जाधव के लिए टिकट की कोशिश कर रही थीं।

एक वरिष्ठ शाखा प्रमुख ने भावुक होकर कहा कि 30–35 साल की निष्ठा के बाद भी साधारण कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर, एक ही परिवार को पति–पत्नी–बेटे–ससुर तक टिकट देने की लाइन लगाई जा रही है। इससे कार्यकर्ताओं के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है।


महिला शिवसैनिक के आरोप से बढ़ी नाराज़गी

हंगामे के दौरान एक महिला शिवसैनिक ने आरोप लगाया कि वह सड़क पर वड़ापाव बेचकर गुज़ारा करती है और 2017 के चुनाव में श्रद्धा जाधव ने महिलाओं में बांटने के लिए उससे साड़ियां ली थीं, जिनके करीब 3 लाख रुपये अब तक नहीं चुकाए गए। उसने बताया कि उसने ये साड़ियां देने के लिए अपने गहने तक गिरवी रखे थे।

एक दूसरी महिला कार्यकर्ता ने कहा कि श्रद्धा जाधव को दोबारा टिकट देकर उद्धव साहब ने हम जैसे कार्यकर्ताओं के साथ गद्दारी की है, और पूछा कि क्या अब जमीनी शिवसैनिक सिर्फ ‘चिंदी’ बनकर रह गए हैं।


‘गद्दार’ की राजनीति, अब उलटी पड़ती दिख रही

शिंदे गुट के खिलाफ लंबे समय से ‘गद्दार’ का नैरेटिव चलाने वाले उद्धव ठाकरे के लिए यह स्थिति असहज है, क्योंकि अब उन्हीं के घर के बाहर उनके खिलाफ ‘गद्दारी’ के नारे लग रहे हैं

मुंबई महानगरपालिका चुनाव को उद्धव ठाकरे के राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई माना जा रहा है। ऐसे में टिकट बंटवारे को लेकर उठी यह खुली बगावत संकेत देती है कि पार्टी के अंदर निष्ठा से ज़्यादा रसूख और परिवारवाद हावी होने का आरोप मजबूत हो रहा है, जो चुनावी गणित पर सीधा असर डाल सकता है।

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